आदमी से आदमी
आदमी से आदमी क्यों जल रहा है, सबके मन में कुछ तो ऐसा चल रहा है। जानते सब लोग फिर न मानते क्यों? अहम हम सबके दिलों में पल रहा है।। ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। कर रहा बर्बाद सबको ये अहम ही, जो सुलगती आग उसमें डालता घी। छिप गया है प्रेम काले बादलों में, राहु जैसे निगलता दिनमान को ही।। ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। समंदर में लहर उठतीं, हजारों मील जातीं हैं। समझकर खुद ब खुद अपना वहीं पर लौट आतीं हैं।। मगर देखो जरा सोचो मिली क्या सीख है हमको। लुटातीं प्रेम फिर दूना जो वापस साथ लातीं हैं।। ******************************** नहीं मिलती आत्मसंतुष्टि किसी को, ढूंढ ले संसार में भेजा उसी को। दर्द दुनिया के भुलाकर करो सेवा, पोंछकर आंसू हंसा सकते किसी को।। ***************************** उस विधाता के बनाए,ये खिलौने, टूटता है एक भी लगते हो रोने। यही बस तुमको समझना देखना है, नहीं तोड़ोगे किसी के तुम खिलौने।। """"""""""""""""""""""""""""""" हांथ ...