Posts

आदमी से आदमी

 आदमी से आदमी क्यों जल रहा है, सबके मन में कुछ तो ऐसा चल रहा है। जानते सब लोग फिर न मानते क्यों? अहम हम सबके दिलों में पल रहा है।। ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। कर रहा बर्बाद सबको ये अहम ही, जो सुलगती आग उसमें डालता घी। छिप गया है प्रेम काले बादलों में, राहु जैसे निगलता दिनमान को ही।। ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। समंदर में लहर उठतीं, हजारों मील जातीं हैं। समझकर खुद ब खुद अपना वहीं पर लौट आतीं हैं।। मगर देखो जरा सोचो मिली क्या सीख है हमको। लुटातीं प्रेम फिर दूना जो वापस साथ लातीं हैं।। ******************************** नहीं मिलती आत्मसंतुष्टि किसी को, ढूंढ ले संसार में भेजा उसी को। दर्द दुनिया के भुलाकर करो सेवा, पोंछकर आंसू हंसा सकते किसी को।। ***************************** उस विधाता के बनाए,ये खिलौने, टूटता है एक भी लगते हो रोने। यही बस तुमको समझना देखना है, नहीं तोड़ोगे किसी के तुम खिलौने।। """"""""""""""""""""""""""""""" हांथ ...

महागौरी

अष्टम् दिवस - महागौरी आज अष्टम् दिवस मां के द्वार जायें । प्रेम श्रद्धा भक्ति से मस्तक झुकायें। श्वेत रूपा गौरवर्णी मां हमारी - वृषभ की करतीं महागौरी सवारी।। कंदफल पत्तों को खाया मां ने मेरी। वायु पीकर की तपस्या कठिन तेरी। वरण शिव का हो सका इस भांति ऐसे- हुआ शिव-शक्ति मिलन महिमा ये तेरी।। धारतीं हैं श्वेत पट,प्रिय भोग हलवा। नारियल जो बांटता चाटे न तलवा। रंग गुलाबी परम प्रिय इस रूप को है - कृपा जिस पर मातु की करता वो जलवा।। व्यथित् करता वंदना सब रोग नासें। शत्रु बनते मित्र,निशिचर दूर कांपें। सभी पर करतीं कृपा हे! मातु अम्बे- पूरी होतीं कामना दर जाके मां के ।। रचना शशिकान्त दीक्षित'व्यथित्' 29/03/2023

नव वर्ष विक्रम संवत २०८०

आया नूतन वर्ष यह, इसे करो स्वीकार। मन्दिर-मन्दिर शंख ध्वनि,लगते जय-जयकार।। लगते जय-जयकार, आज से विक्रम संवत। दो हजार अस्सी का, ऐसा भव्य हो स्वागत।। व्यथित न अब मजदूर कृषक,रखना प्रभु दाया। पकी हुई सब फसल, काटने का दिन आया।। सच होता आभास अब, प्रकृति हुई मदमस्त। डाल-डाल फल-फूल से, लदी  हुई इस वक्त।। लदी हुई इस वक्त,नये परिधान सजाये। स्वागत सबका करे, लग रही आंख विछाये।। आदिशक्ति आराधन, चैत्र शुक्ल से होता। कर जगराता भक्त मांगते जो,सच होता।। रचना शशिकान्त दीक्षित'व्यथित्' फतियांपुर हरदोई उ प्र २२/०३/२०२३

कविता

 कविता दिवस पर विशेष उद्गार शब्द बन जाते हैं। कल्पना चित्र मड़राते हैं।। श्रंगार, हास्य और समरसता। तब स्वतः जन्म लेती कविता ।। कविता करती है आनन्दित। रहना कैसे है,मर्यादित।। कविता ज्वाला, कविता धारा। कविता है पवन,सूरज,तारा।। कविता है मर्म्,उमस दिल की। कविता ही कथा है रघुवर की ।। कविता राधा, कविता मीरा । है सूर रहीम यही कबीरा ।। कविता स्तुति, श्लोक, छंन्द । मीठी,तीखी,स्वच्छंद, व्यंग ।। कविता वीरों की शक्ति है । कविता ही प्रभु की भक्ति है ।।      रचना शशिकान्त दीक्षित व्यथित् ग्राम फतियाँपुर पो.सुगवाँ जि.हरदोई उ.प्र. मो.9793238457

देवराज इन्द्र की सभा

 एक बार देवराज इन्द्र ने एक आपात बैठक बुलाकर अपने राज काज की समीक्षा करने के उद्देश्य से देवताओं को आमंन्त्रित किया और उनसे इस प्रकार  वार्तालाप कर उनकी समस्याओं को जानने का प्रयास किया ........ हुयी स्वर्ग में सभा एक दिन देव वहाँ सब आये l एक दूजे को नमन किया और आसन सबने पाये ll अगर समस्या हो कोई तो फौरन हल हो उसका l प्रजा हमारी सुखी रहे,ये राज देवताओं का ll सूर्य देव से पूँछा क्यों तुम इतनी करते गर्मी l पवन देव से भी ये पूँछा मौसम में क्यों नरमी ll श्री कुबेर जी आप बतायें कैसा हाल तुम्हारा l धर्मराज तुम भी बतलाओ निर्णय कोई प्यारा ll सबकी क्षमता,शक्ति,ग्यान का होगा आज प्रदर्शन l प्रजा के दिल में जगह बनायी करवाया निर्वासन ll तभी एक स्वर देव हैं बोले देवराज हो मॉफी l पृथ्वीलोक पर आया देखो एक बड़ा सन्यासी ll कहने को भारत का पी एम है वो बड़ी समस्या l हर हर मोदी घर घर मोदी मेरा काम बचा क्या ll सूर्यदेव सी चमक है उसमें पवन देव सा चलता l आज यहॉ कल रात कहॉ हो पता न क्या कर सकता ll सरस्वती की कृपा है उस पर जो कहता हो जाता l सगुण विरोध करे लक्ष्मी का निर्गुण से जोड़े नाता ll कहत भृष्टाच...

बागेश्वर बालाजी धाम

 क्यों अस्तित्व नकार रहे हो अपने पैदा होने का । मानव हो तुम कृत्य कर रहे देह दानवी ढोने का ।। 1 हिन्दू संस्कृति और सभ्यता को तुम समझ नहीं पाये । प्रतिकण व्याप्त शक्ति है बिन गुरु ज्ञान नहीं होने पाये ।। 2 क्या विज्ञान तुम्हारा अब तक स्वयं पूर्ण हो पाया है ?  नतमस्तक कर दिया प्रकृति ने जब मानव बौराया है ।। 3 कोई पूजा-पाठ धर्म ग्रंथों पर प्रश्न उठाता है। समझ न आता कैसा हिन्दू हिन्दी का वो ज्ञाता है ।। 4 दादा, परदादा थे कैसे नाम न बतला पायेंगे। मेरे सत्य सनातन पर वो ज्ञान अनोखा लायेंगे।। 5 धर्म ध्वजा न झुकने वाली और तेज लहरायेगी। धर्म विरोधी ताकत के उर को वह अब दहलायेगी ।। 6 बड़े सींग और दांतों वाले असुर नहीं अब धरणीं पर । सूट बूट और चश्मा डिग्री लिए घूमते हैं निशिचर ।। 7 अच्छे और सुपात्र व्यक्ति का ज्ञानी होना अच्छा है। नियत खोट से भरी हुई वो ज्ञानी होकर लुच्चा है ।। 8 'व्यथित' भक्त शरणागत होकर ध्यान तुम्हारा धरते हैं। आकर शरण तुम्हारे दर पर अभिलाषा जो करते हैं।। 9 पूरी होती मनोकामना  दुष्ट हृदय पर डांका है ।  रचते हो षड़यंत्र दिनों-दिन मुझको कम क्यों आंका है।।10 हे बा...

बड़बोलापन

 शरम्  न आवै कैसन शिक्षा मंत्री बनिगये देश मा , अंगुरी उठा रहे हउ देखउ जनमेउ जेहि परि वेश मा।। बप्पा ने कछु सोंचि समझिके नाउ धरो चन्द्रशेखर, डिगरिउ पाइ गए हैं भइया पढि-लिखि भए मिनिस्टर।। आजु रहे पछिताइ हमारे शिव शंकर बम भोले । पकड़ि बिरादर अपनो लावउ नंदी ते यहु बोले ।। मनु आवति सो बोलि रहो फंसि जइहइ अपनेइ केश  मा। अंगुरी उठा रहे हउ देखउ जनमेउ जेहि परि वेश मा।। दागु लगाओसि रामायण मा औरु नाउ मा म्हारे। औरु कोइ पर बोलतेउ बच्चा दिन मा देखतेउ तारे।। सबकी समुझि न आवैइ यै हैं मानस की चौपाई, अर्धाली मा गोंता खायेन पायेन  नाहीं थाही ।। बुरी आत्मा भटक रही है देखउ तुम्हरे वेश मा। अंगुरी उठा रहे हउ देखउ जनमेउ जेहि परि वेश मा।। तुलसी,सूर,कबीर के रोंवा, भरि ना हैं पी एच डी। पढ़े लिखे ते कुपढ़ा अच्छे बात करेनि जन हित की।। जन-जन घोरि रहे ह उ नफरत जाति-पांति पर बोलउ। अर्थ अनर्थ करै का लागेउ बात न अपनी तोलउ ।। असरु कहां तक जइहइ ददुआ तुम्हरे यहि उपदेश मा। अंगुरी उठा रहे हउ देखउ जनमेउ जेहि परि वेश मा।। रामायण हइ  ग्रन्थ हमारो पूजनीय  सम्मानित। बोलिगैउ अब सोंचि के बोलेउ नत होइह...